हवन की विधि ओ३म् जो आर्य प्रतिदिन यज्ञ करते है, उनके लिए महर्षि ने संस्कारविधि में दैनिक अग्निहोत्र विधि इस प्रकार लिखी है आचमन मंत्र ओं शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शंयोरभिस्त्रवन्तु न: ।। अग्न्याधान-मन्त्र ओं भूर्भुव: स्वः ।। इस मंत्र का उच्चारण करके ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य के घर से अग्नि ला अथवा घृत का दीपक जला, उससे कपूर में लगा, कसी एक पात्र में धर, उसमें छोटी-छोटी लकड़ी लगा के यजमान या पुरोहित उस पात्र को हाथों में उठा, यदि ग्राम हो तो चिमटे से पकड़कर, अगले मंत्र से आधान करे। वह मंत्र यह है (सं० वि० सामान्यप्रकरण) ओं भूर्भुवः स्वर्धौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा । तस्यास्ते पृथिवी देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाधायादधे ।। इस मंत्र में दो उपमालडकार हैं। हे मनुष्य लोगों ! तुम ईश्वर से तीन लोकों के उपकार करने वा आपनी व्याप्ति से सूर्य प्रकाश के समान, तथा उत्तम गुणों से पृथ्वी के समान अपने-अपने लोकों में निकट रहनेवाले रचे हुए अग्नि को कार्य की सिद्धि के लिए यत्न के साथ उपयोग करो । ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च । आस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस...